एक खाली सा मन लिए जिए जा रही थी मैं ,अकेले रास्ते पे खुद ही चल थी थी मैं ..
ना जाने कहाँ से मेरी ज़िन्दगी में तुम आ गए …
एक पल में मुझी को मुझ से चुरा के ले गये
दिन वीरान से , रातें सुनी सी गुज़ार रही थी मैं,
खुद को खुद ही से .. जुदा मान रही थी मैं ..
ना जाने कैसे यह पल मुझे तुम दे गए ...
जीने का एक हसीं बहाना बनके तुम आ गये.
दिल की तमनाओं को यूँही दबा रही थी मैं,
इस सन्नाते को ही अपना मान रही थी मैं ..
न जाने कब इस दिल के उलझे तार तुम छेड़ गए ..
अपनी चाहत बनाकर के मुझे ले गये.
चुप सा हो गया था मेरा मन और धडकनों को भी दबा रही थी मैं,
ख़ामोशी को ही अपने जीवन में उतार रही थी मैं ..
ना जाने कैसे एक कशिश , एक एहसास तुम जगा गये ..
मेरी होती इस गुमनाम हस्ती को फिर से मेरे से मिलवा गए .
खुद से ही नाराज़ हो कर जी रही थी मैं,
हर किसी को पराया मान रही थी मैं ..
ना जाने ज़िन्दगी के कौन से पहलु तुम मुझे दिखा गए ..
मेरे जीवन में हर रंग भरने को तुम आ गये.
तुम आ गये ...
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