Saturday, April 2, 2011

maa tum kahan ho !!

उस का बच्चा भूखा बैठा हुआ है, उसे जल्दी घर पहुंचना है .सुबह भी तो वोह भागती हुई आई थी .कितना रो था मुन्ना  , पर क्या करे वोह, ३ दिन से बीमार है पर काम पे नही जायेगी तो २ वक़्त का खाना कैसे आएगा . आज भी २ रोटी के लिए तड़प रही है वोह ताकि अपने भूखे  बच्चे को शांत कर सके एक दिन के लिए. 

आज मालकिन के यहाँ बहुत काम है , उनके बेटे का जन्मदिन है , बहुत लोग आयेंगे, बहुत काम होगा.  तभी एक आदमी आया और काम  दे गया, सारे बर्तन धोने हैं, कैसे करे वोह.. सुबह से शाम होने को आई है और अभी तक वोह घर नही पहुँच पायी है.. उसका बच्चा माँ माँ पुकारता हुआ रो रहा होगा . उसे महसूस हो रही है अपने जिगर के टुकड़े की चीख. आज तक कुछ भी तो नही दे पा रही है वो उस नन्हे से जीव को ना खाना , ना प्यार , ना वक़्त . आज अगर उसने यह फैसला ना लिया होता तो उसका बच्चा भूखा नही होता , यह सब तो नियति का खेल है , किसके किस्मत में क्या लिखा है वोह तो ऊपर वाला ही जाने .

तभी एक खेलती हुई बच्ची उसके पास आई , उसका मासूम चेहरे को देख कर वोह कुछ देर के लिए सब भूल गयी और खुद भी थोड़ी  देर के लिए बच्ची बन गयी..तभी उसे ख्याल आया की उसका मुन्ना  भी इतना ही बड़ा है और उसकी एक मुस्कान देखने के लिए तड़प जाती है वोह पर क्या करे आज कैसे घर पहुंचे जल्दी .आज को गंगू मासी भी घर नही गयी होगी , वोह भी बुरे वक़्त से गुजर रही है..कितना सहारा रहता है उसे उनका , एक माँ की कमी पूरी कर देती है वोह , मुन्ने को वोह संभाल लेती हैं शाम को आके ..पर आज दिन अलग है.. उसका दिल भी घबरा रहा है .. काश कोई मेरी स्तिति समझ पाता ..

यहाँ कितना खाना बना है , कितने पकवान बने हैं, लोग कितने खुश हैं , हर तरफ हसी और शोर है . एक रोटी के टुकड़े के लिए मेरा मुन्ना घर पे तड़प रहा होगा... जाने क्यूँ भगवान ऐसे खेल खेलता है ..

तभी एक औरत आई उसके पास और जाने के लिए बोली.. उसे लगा मनो उसे ज़िन्दगी मिल गयी हो.. अब जाके ही खाना बनाएगी वोह और अपने हाथों से मुन्ना को खिलाएगी .पर रात होने को आई है .. खाने का इंतज़ाम कैसे करेगी वोह , अभी इस समय तो बंसी दूकान वाला भी नही खुला होगा . तभी एक आदमी ने अपनी पलते धोने के लिए दी .. कितना खाना  छोड़ा हुआ है .. इतने में तो हम २ दिन चला सकते हैं. कैसे कैसे इंसान होते है दुनिया में.. जिनके पास जो होता है उन्हें उसकी कद्र नही होती. 

क्या करे वोह .. येही खाना  ले जाये घर .. उसका मुन्ना रोयेगा नही.. उसका पेट भी भर जाएगा.. किसी की झूठन उसकी ज़िन्दगी बन सकती है..इसी उलझन में उसके आंसू आ जाते हैं और वोह खाना एक लिफ़ाफ़े में दाल लेती है.

अजीब सा मन लिए हुए घर पहुँचती है, दरवाज़ा खोलती है.. उसका बच्चा बिलक बिलक कर रोते हुए सो चुका है  वोह उसे प्यार से उठाती है फिर सोचती है की ऐसी होती है ज़िन्दगी की मजबूरियाँ की जिनके लिए वोह जीती है उन्ही के लिए उसे वक़्त नही है.. तभी २ कौर मुन्ना के मुह में डालती है .. अपनी माँ को आया देख मुन्ना मुस्कुरा देता है.. ऐसा लगता है मानो इसी पल के लिए वोह जिंदा बचा हुआ हो.... उसकी मुस्कराहट देख कर उसे लगता है मानो उसमें एक नयी जान आ गयी हो कल का सामना करने की.. उस कल को जो फिर से कोई संघर्ष लेके आएगा उसके और उसके बच्चे के लिए.. यही तो रात के ४-५ घंटे होते जब उसे अपने अन्दर दिल होने का एहसास होता है.. वरना सारे दिन तो  बस वोह एक मजदूर होती है जिनके पास न दिल होता है ... ना आवाज़ ..होता है तो बस भूख  को मिटाने की प्यास ...... 


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